Kar seva

KARSEVA AT GURUDWARA

कहते है गुरू ग्रंथ साहिब के अमृतसर वाले सबसे बड़े घर की नींव किसी हज़रत मिया मीर जी ने रखी थी, मुझे मेरा नाम मीर सैयद अमीर मुस्तफा हाशमी पर-दादा मीर सैयद वासर अली से मिला है, मेरे शहर के छोटे से गुरूद्वारे की नींव से लेकर छत के बन जाने तक वहां कारसेवा की है, मुझे खुशी है की ख़ुदा के एक घर की मैंने नींव रखीं है, क्या हुआ अगर जो वो मेरा ख़ुदा नहीं है, क्या मैं किसी के धर्म की इतनी इज़्ज़त भी नहीं कर सकता हूँ जो मुल्लाओं ने मुझपर काफ़िर होने के फ़तवे निकाल रखे है, जाने कौन सी कुरआन पढ़ते है ये लोग, मेरा इस्लाम तो ऐसा नहीं है. मैंने 17 दिन लगातार नींव की खुदाई से लेकर लैंटर्न की ढलाई तक हर रोज़ शाम 5 बजे से 11 -12 बजे तक कारसेवा की, मेरी पंजाबी बहुत अच्छी हैं तो हुआ यूं कि काफ़ी दिनों तक जब तक काम चलता रहा कोई भी ये नहीं जानता था कि मैं मुसलमान हूँ, वो मुझे शहर का कोई आम लड़का समझ रहे थे, आखिरी दिन का जब काम ख़त्म हुआ तो सबने मेरे साथ ग्रुप फोटो खींची और मेरी कॉल पर अमृतसर के एक शख्स से बात कराई जिन्हें वो बड़े दार जी कह रहे थे, वो शहर गुरूद्वारा साहब के मुख्य पंडितो में से थे, उन्होंने ही मुझे हज़रत मिया मीर जी वाली बात बतायी और मिनटों तक बड़ी दुआए देते रहें, बस उन दुआओं को सुनकर लगा जैसे मेहनताना मिल गया हो, मेरे हाथ में छालों का दर्द ले लिया उन दुआओ ने, 12 वें दिन के बाद पानी भी खूब गिरने लगा था और हाथों में शदीद छाले पड़ चुके थे, हाथों में कपड़ा लपेट मैं सीमेंट फेंकता रहा, मैं ख़ुद खा नहीं सकता था लेकिन लंगर खिलाता रहा, ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमाई में से एक हैं. क़यामत में जब अल्लाह मुझसे मेरे किये का हिसाब मांगेगा, तो मैं उनकी मखलूक के बीच मुहब्बत की डोर था, ये बताते का अब मेरे पास सामान हैं.