तानवट-नवापारा जंगल सत्याग्रह

1930 में महात्मा गांधी ग्रामीण कांग्रेस को संगठित करने में लगे थे। “गांधी टोपी” प्रतीक बन चुकी थीं स्वतंत्रता के सिपाही और कांग्रेस का प्रभाव बढ़ रहा था। पुलिस का अत्याचार और लूट खसोट तानवर-नवापारा इलाके में बढ़ गया। शहरी क्षेत्रों में तो बड़े नेताओं के दबाव और भय के कारण ब्रिटिश पुलिस संयम बरतती थी, पर ग्रामीण क्षेत्रों में वह पूरी तरह बेलगाम थी। वर्तमान में नवापारा और खरियार अब ओडि़शा में सम्मिलित हैं, 1 अप्रैल 1935 तक ये छत्तीसगढ़ के महासमुंद तहसील में शामिल इलाके थे, उसी दिन उड़ीसा राज्य का निर्माण हुआ था।

तानवट-नवापारा इलाके में स्वदेशी का प्रचार और मद्य निषेध का कार्यक्रम संचालित हुआ था। ये दोनों गांव खरियार जमींदार के अंतर्गत आते थे। वहां जमींदार के अत्याचार के कारण लोगों में असंतोष व्याप्त था, क्युकि जमींदार लोगों से बेगार लेने का आदि था। किसानों पर लगान का बोझ लदाने का वह बहाना ढूंढता रहता था। यहां तक कि आसपास के मालगुजारों से भी उसके रिश्ते अच्छे नहीं थे। पुलिस के साथ जमींदार के गुर्गे भी लाठियों और बंदूकें लेकर घूमते थे। अत्याचार की खबरें जिला कांग्रेस कमेटी के पास पहुंची, तो जांच के लिए ठाकुर प्यारेलाल सिंह, मौलाना अब्दुल रऊफ खां, भगवती प्रसाद मिश्र, यती यतन लाल और 11 अप्रैल 1931 को तानवट-नवापारा निरिक्षण के लिए गए.

रायपुर कांग्रेस कमेटी के प्रांतीय दौरे ठाकुर प्यारेलाल सिंह किया करते थे, आम तौर पर गवाहों और पीड़ितों से ठाकुर प्यारेलाल सिंह ही बात करते थे, जिसे लिखित रूप में दर्ज करने का कार्य मौलाना अब्दुल रऊफ खां करते थे. इस दल ने पांच केन्द्रों में जांच की, 14 अप्रैल को तमोरा, 15 को तानवट-नवापारा, 16 को खरियार, 17 को चौकबेड़ा व 18 अप्रैल को पिथौरा में पीडि़तों से मुलाकात कर उनसे गवाही ली गई। हालांकि जांच के लिए उपयुक्त समय नही मिल सका लेकिन जो सामने आया वो तत्य भयावह था, पोलिस के अत्याचारों से लोग डरे हुए थे, समय की कमी के कारण पूर्ण रूप से सूचना भी नहीं मिल सकी। फिर भी, उन्होंने गवाहों से हुई बातचीत के आधार पर जो रिपोर्ट तैयार की वह अत्याचारों की इंतिहां को बताने के लिए काफी थी।

कांग्रेस का आंदोलन महासमुंद तहसील में व्यापक था, लेकिन तानवट-नवापारा में ठीक जड़ नहीं पकड़ सका था। विदेशी बहिष्कार और शराबबंदी आंदोलन का जोर था, विकेटिंग भले ही कुछ स्थानों में हुआ पर प्रचार का कार्य व्यापक था, कुछ सभाएं ली गईं और एकाध बार हड़ताल भी रखी गई। 15 अप्रैल 1931 को जांच दल जब तानवट-नवापारा पहुंच तब तक इलाके के 28 लोग जेल में थे, जिनमें मालगुजार और किसान शामिल थे। उन्हें 6 माह से 4 साल तक की सजा हुई थी। तानवट-नवापारा से 5 मील दूर सलिहा गांव में पुलिस ने गोलियां चलाई और लोगों को लाठियों से पीटा गया था.

जमींदार के अन्यायपूर्ण बेगार, रसद और लगान से त्रस्त कुछ लोगों ने रायपुर के डिप्टी कमिश्नर से शिकायत की थी, इस शिकायत पर जमींदार पर दो सौ रुपए का जुर्माना तो लगा दिया गया लेकिन जमींदार ने बकाया कर्ज वसूलने का दमनात्मक रवैया अपना लिया। हालांकि संगठित ग्रामीणों ने रसद-बेगार बंद कर दिया और कर्ज अदा करने से भी इंकार कर दिय, ऐसे में जमींदार ने तब जंगल की हर वस्तु पर टैक्स बढ़ाकर चार गुना कर दिया। ग्रामीणों की रोजी-रोटी के अलावा लकड़ी और पशुओं के लिए चारा जंगल से ही उपलब्ध होता था, ग्रामीणों ने तब “जंगल-कानून” तोडऩे का निश्चय कर लिया। जमींदार के वसूलीकर्ता गुर्गे दिसम्बर-जनवरी में वसूल किए जाने वाले चराई की रकम सिंतबर में मांगने लगे, इस पर लोगों ने एतराज किया। गुर्गे गुंडागर्दी पर उतारू हो गए और एक सप्ताह के भीतर कई गांवों के मवेशी कांजी हाउस में बंद कर दिए गए।

छत्तीसगढ़ के गावों में एक परंपरा वर्षों से चली आ रही थी, जिसमें दशहरे के दिन ग्रामीण जमींदार से भेंट करने जाते और उन्हें अपनी समस्याओं से अवगत कराते थे।दशहरे से दो दिन पूर्व जमींदार से चर्चा करने के विषयों पर विचार करने के लिए सलिहा में ग्रामीण एकत्र हुए, थोड़ी ही देर में पुलिस और जमींदार के कर्मचारी सभा स्थल पहुंच गए और लोगों के लकड़ी और छाता एक जगह रखवा लिया गया, टोपी और गमछा छिन लिए गए और आग लगा दी गई। लोग कुछ समझ पाते उससे पूर्व सर्किल इंस्पेक्टर के आदेश पर पुलिस बल ने सभी को लाठियों से पीटना शुरू कर दिया, और घंटेभर तक पुलिस और जमींदार के लोगों को बेरहमी से पीटा। लोग जान बचाकर जंगल की ओर भागे तो दूसरी तरफ पुलिस वाले गांव में घुस गए, जहां केवल महिलाएं और बच्चे ही थे, गांव में घुसते ही हवाई फायर किया गया। पुरुषों की जान के प्रति सशंकित महिलाएं लाठियां लेकर घरों से निकल पड़ीं। वे मरने-मारने के निश्चय के साथ पुलिस के सामने डट गईं। स्त्रियों का रौद्र रूप देखकर पुलिस और जमींदार के गुंडों ने भागने में ही भलाई समझी। काफी दूर तक महिलाओं ने उनका पीछा भी किया, जिसके शोरगुल सुनकर जंगल में छिपे पुरुष भी बाहर निकल आए। भागते पुलिस कर्मी दो मील दूर पटपरपायली में सुस्ता रहे थे कि किसी ने सर्किल इंस्पेक्टर को पत्थर से मार दिया, पुलिसबल ने वापस दौड़कर इस घटना में 28 लोग गिरफ्तार किए। घटना की सूचना पर 26 मार्च 1931 को डिप्टी कमिश्नर पटपरपायली पहुंचा, तो उनसे कांग्रेस की सभा का झांसा देकर गाँव वालों को वापस को एकत्र किया, और लोगों को इनाम दिया गया तथा मिठार्ई व पान, बीड़ी का तोहफा दिया गया, लेकिन झांसा की सच्चाई पता चलने के बाद लोगों ने मिठाई व पान-बीड़ी स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

उरलू कोटवार को 75 रुपए बतौर इनाम दिया गया और उसे डिप्टी कमिश्नर से हाथमिलाने का सौभाग्य मिला, इस दौर में डिप्टी कमिश्नर इलाके में किसी राजा से कम नहीं था. यह उरलू कोटवार ही था, जिसके माध्यम से ही पटपरपायली के डिप्टी कमिश्नर ने कांग्रेस की सभा होने का झूठा कराई थी. डिप्टी कमिश्नर के दरबार के बाद सौ डंडा पुलिसवालों ने हर गांव से 300 से 400 रुपए जुर्माना वसूला गया, लोगों के घरों की तलाशी ली गई, लोगों को गिरफ्तारी का डर दिखाकर रुपए ऐंठे गए, जो रुपए देने में असमर्थ थे उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और बहुत ज़्यादा बेरहमी से लोगों से मारपीट की गई, पुलिस वाले उनके बकरा, मुर्गा, चावल, दाल और घी लूटे गए।

Published by Amir Hashmi

Amir Hashmi is an Indian Film Producer, Director, Writer, and Actor awarded the ‘Film excellence award’ by the Ministry of Information and Broadcasting, Govt. of India. Apart from being an artist, he is an outstanding speaker who hosted hundreds of inspiring workshops and campaigns amongst the youth. Awarded ‘Sangeet Visharad’ in Hindustani classical singing. He consistently promotes culture, humanity, and morality, and believes in truth and non-violence, besides being known for his environmental and patriotic initiatives.

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