महात्मा गांधी का दांडी मार्च (12 मार्च 1930)

महात्मा गाँधी ने आज के दिन 12 मार्च को आम भारतीयों के शोषण करने वाला नमक कानून को तोड़ने के लिए एतिहासिक दांडी यात्रा की शुरुआत की थी।

1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन में गांधीजी ने पूर्ण स्वराज्य की मांग अंग्रेजों के सामने रखी जिससे अंग्रेजों और गांधी के बीच सीधा टकराव बढ़ गया।

गांधी अनेक दिनों तक सोच विचार कर अपनी अंतरात्मा की आवाज का इंतजार करते रहे। आखिर उनकी अंतरात्मा की आवाज ने एक ऐसा रोमांचक व नाटकीय तरीका खोज निकाला जिससे वे रातों रात प्रसिद्ध हो गए और विश्व क्षितिज पर छा गए। साबरमती आश्रम में गांधीजी ने कहा कि अब मेरे साबरमती छोड़ने का वक्त आ चुका है। अब इस आश्रम में जब तक नहीं आऊंगा जब तक देश आजाद नहीं हो जाता। उन्होंने अपने 78 साथियों से कहा कि अगर सबसे ताकतवर सत्ता भी यदि तुम्हें कोई आज्ञा दे तो उसकी जांच करो उस उसके बारे में सोचो यदि वह तुम्हारी व्यक्तिगत न्याय की परिभाषा की कसौटी पर खरा उतरती हो तो उसे मानो। लेकिन यदि वह तुम्हारी व्यक्तिगत कसौटी की परिभाषा पर खरी नहीं उतरती तो अकेले उसका विरोध करने का साहस अपने भीतर पैदा करो। इसलिए दांडी मार्च गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत थी। जिसका सरल भाव यह है कि सविनय अवज्ञा करना, आज्ञा का पालन नहीं करना हालांकि वह सबसे बड़ी सत्ता के द्वारा दी जा रही है।

मीरा बेन ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि 11 मार्च, 1930 की दरमियानी रात पूरा साबरमती आश्रम जागा हुआ था। पूरा गांव एक जगह एकत्रित था और वहां वाहनों की लंबी कतारें लग गई थी, सरदार पटेल और जवाहरलाल चिंतित और व्याकुल थे । पूरी रात यही चर्चा होती रही कि कल क्या होगा ? क्योंकि हर कोई जानता था कि दांडी मार्च के शुरू होते ही गांधी जी को निश्चित रूप से गिरफ्तार कर लिया जाएगा। मीरावेंन लिखती हैं कि जब सारा आश्रम जाग रहा था, तब एकमात्र इंसान जो गहरी नींद में सोया था, वो महात्मा गांधी थे! कल क्या होना है; उसकी चिंता क्यों की जाए? अब मुझे सोने दो!! और वे सो गए! उनके पास सत्व और मानसिक शांति का यह अद्वितीय गुण था, जो उन्हें कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक रहने की ताकत देता था।

12 मार्च 1930 की सुबह साढ़े छः बजे गांधीजी अपने 79 अनुयायियों को साथ लेकर 241 मील(388 किलोमीटर) दूर समुद्र की ओर बढ़ने लगे। इन 79 अनुयायियों में से अधिकांश का भाव यही था कि अहिंसा साधन मात्र है और इसका उपयोग हमने इसलिए किया है क्योंकि हिंसक साधनों से अंग्रेजों का मुकाबला करने की कुब्बत हमारे अंदर नहीं। गांधी इस इस विचार को नहीं मानते थे । वे अहिंसा को गंवाकर देश को आजाद कराने के पक्षपाती नहीं थे। देश की आजादी उनका बहुत बड़ा मकसद था पर वे हिंसा को पशुओं का हथियार मानते थे और अहिंसा को ताकतवर आदमी का आभूषण।

241 मील लम्बे इस मार्ग में हजारों श्रद्धालु उनके दर्शनार्थ पूरे रास्ते पर खड़े थे । गांधी के पैरों में छाले न पड़ें इसलिए लोगों ने रास्ते में हरी पत्तियां और हरी घास बिछाकर रास्ते की कठोरता को कम किया । सारी दुनिया के अख़बारों ने गांधी के इस अद्भुत और विचित्र जुलूस के समाचार एकत्रित करने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे ।गांधी का पैदल जुलूस जिस गांव से गुजरता गांव का एक एक व्यक्ति झुककर , लेटकर,जमीन को चूमकर उनका स्वागत करने को आतुर हो उठा। गांधी ने जान बूझकर ऐसा चक्करदार रास्ता अपने लिए चुना जिससे उनका जुलूस अधिक से अधिक गांवों और बस्तियों पर अपने प्रभाव की किरणें छोड़ता हुआ समुद्र की ओर बढ़ने लगा।

पत्रकार और विदेशी समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों के लिए धीरे धीरे समुद्र की ओर बढ़ता यह मार्च जितना अधिक रोमांचक था अंग्रेजों की बौखलाहट और तीव्रता उतनी ही अधिक बढ़ती जा रही थी। आज इस आंदोलन का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि इस आंदोलन ने गांधी को अंतराष्ट्रीय शख्सियत बना दिया। वे अमेरिका की टाइम मैगजीन के ‘मैन ऑफ ईयर’ का स्थान पाने वाले एकमात्र भारतीय हैं।

5 अप्रेल 1930 की शाम छः बजे गांधी अपने अनुयायियों के साथ दांडी नामक गाँव पहुंचे जो समुद्र के किनारे पर स्थित था। पूरी रात भजन कीर्तन चला सुबह सूर्योदय से पहले सबने समुद्र में स्नान किया। इसके बाद गांधी ने लाखों दर्शकों की गवाही में धीरे धीरे समुद्र के किनारे उस हिस्से की तरफ बढ़ना शुरु किया जिधर नमक तैयार होता था। वे झुके और नमक की मुट्ठी भर ली उन्होंने वहां मौजूद लोगों को मुट्ठी दिखाई ।गंभीरता के साथ हाथ उठाकर उन्होंने मुट्ठी खोल दी । नमक के सफेद रवे बिखर गए । भारतीय आजादी का नया संबल बना – नमक

गांधीजी की यात्रा 24 दिन में सम्पन्न हुई वे जिस रुट से गए उसका नक्शा दिया हुआ है। दांडी कूच के समय गाँधी ने 11 नदियाँ पार की थीं वे असलाली, मातर, नाडियाड, आनद, बोरसाद, कनकपुर, करेली, आँखी, आमोद, सामिन, देहरोल, अंकेश्वर, मांगरोल, उमर्छ, भाकतान, देलाद, सूरत, वाज, नवसारी, मावेत, सैफ़ी विला , नानी पेथाण होकर गए। वापसी में कराड़ी से आधी रात को गाँधी की गिरफ़्तारी हुई थी। अंग्रेजों ने फ्रंटियर मेल को दो स्टेशनों के बीच रोककर गिरफ्तार गांधीजी को उस पर चढ़ा दिया था। अंग्रेजों ने सोचा कि उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर लोगों तक पहुँचने से पहले उनको गुजरात से बाहर पहुँचा दिया जाए।

नमक कानून तोड़ने के आरोप में अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर लोगों की गिरफ्तार किया । गांधीजी को नमक कानून तोड़ने और लोगों को भड़काने के आरोप में फिर गिरफ्तार कर लिया और फिर से यरवदा जेल में डाल दिया।

दांडी अब बदल चुका है। गांधीजी ने साबरमती से दांडी तक 241 मील यानी 388 किलोमीटर की यात्रा तय करने में 24 दिन लगाए । गांधीजी के बाद पैदल यात्रा करने वाले आस्ट्रेलिया के इतिहासकार थॉमस बेवर और बीबीसी के पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने साबरमती से दांडी तक की 425 किलोमीटर की यात्रा पैदल सम्पन्न की।

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