देखने की आज़ादी “एक गौरावकथा”

*गौरवकथा*

दो-तीन लड़के एक लड़की के साथ बलात्कार की कोशिश कर रहे थे। आते-जाते लोग जिज्ञासावश एक नज़र डालते और गुज़र जाते। अभी यह प्रक्रिया चल ही रही थी कि कुछ युवकों का उत्साही झुंड वहाँ आ पहुँचा। इन युवकों के सरदार ने रौबदार आवाज़ में बलात्कार की कोशिश कर रहे लड़कों का मज़हब पूछा, बलात्कार की कोशिश में शामिल कोई भी लड़का पूछने वाले की मज़हब का नहीं था। इसके बाद उसी युवक ने लड़की का मज़हब पूछा; लड़की का मज़हब भी पूछने वाले का मज़हब नहीं था। युवकों की टोली ने राहत की साँस ली। *”भई ये तो इनका आपसी मामला है! हमें क्या! चलो!”* तभी टोली के एक अन्य युवक ने कहा, “भाईजी अगर हमारा ‘देखना’ इनके निजी मामले में हस्तक्षेप न हो तो थोड़ी देर रुक जाते हैं!” सरदार ने कुटिल मुस्कान के साथ उस युवक को देखा। *”अमाँ यार सही कहते हो। लोकतंत्र में और किसी चीज़ की आज़ादी हो-न-हो, देखने की आज़ादी तो है ही।”* …और इस तरह बलात्कार होता रहा और धर्म-निरपेक्षता मूकदर्शक बनी रही!

चोरी का कंटेन्ट है, गौरव त्रिपाठी के पेज से लिया गया

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